‘हम, भारत के लोग और हमारा संविधान उत्सव’ विषय पर सेवाग्राम में ‘विकास संवाद’ की तीन दिवसीय संगत संपन्न

सेवाग्राम। 2, 3 और 4 अगस्त को ‘विकास संवाद’ (भोपाल) ने ‘हम, भारत के लोग और हमारा संविधान उत्सव’ केन्द्रीय विषय पर सेवाग्राम, वर्धा (महाराष्ट्र) में तीन दिवसीय संगत का आयोजन किया। जिसमें बड़ी संख्या में देश भर के मीडियाकर्मी, सामाजिक कार्यकर्ता और एडवोकेट शामिल हुए। दादा धर्माधिकारी कक्ष में आयोजित इस संगत में अलग-अलग सेशन में संविधान, नागरिकों के संवैधानिक अधिकार और संवैधानिक मूल्यों पर विस्तृत चर्चा हुई।

बैठक की शुरुआत संविधान प्रस्तावना के सामूहिक वाचन से हुई। स्वागत उद्बोधन एवं आयोजन की रूपरेखा पर एक मुख़्तसर वक्तव्य ‘विकास संवाद’ के निदेशक सचिन कुमार जैन ने देते हुए कहा, ”संविधान संवाद’ विकास संवाद की नई पहल है और उसका उद्देश्य संवैधानिक मूल्यों को लेकर लोगों में जागरूकता पैदा करना है। ख़ास तौर से हमारे संविधान की जो उद्देशिका है, उसका आम जन में प्रसार और चर्चा को बढ़ावा देना है।

 ‘संविधान संवाद’ की इस पहल का उद्देश्य सिर्फ़ इतना है कि हम यह चेतना विकसित कर पाएं कि हमारे ​लेखन से न्याय, गरिमा, बंधुत्व, व्यक्ति की स्वतंत्रता और लोकतांत्रिक मूल्यों का विस्तार हो।” उन्होंने कहा, ”संविधान संवाद’ ने साल 2022 से लेकर 2025 तीन साल के दरमियान में मध्य प्रदेश के 48 पत्रकारों और 12 वकीलों को अलग-अलग विषयों मसलन ‘शिक्षा का संवैधानिक मूल्य’, ‘सामाजिक समरसता और समता की मौलिक तस्वीरें’, ‘ग्राम स्वराज में लोकतांत्रिक प्रावधानों की स्थिति’, ‘स्वास्थ्य का अधिकार : गरीबों के दृष्टिकोण से गरिमा और समानता’, ‘मालिक और मज़दूरों को विधि के समक्ष समानता और बंधुआ मज़दूरी’ आदि पर फैलोशिप प्रदान की है। इसका असर यह हुआ कि उन्होंने न सिर्फ़ संवैधानिक मूल्यों को जाना, माना बल्कि अपनी ज़िंदगी और प्रोफ़ेशन में भी अपनाया।” 

स्वागत उद्बोधन के बाद ‘संविधान संवाद’ की सह संयोजक पूजा सिंह ने संविधान संवाद का परिचय और गतिविधियों की जानकारी दी। ‘सेवाग्राम, गांधी और हम भारत के लोग’ विषय पर अपना परिचय वक्तव्य देते हुए गांधीवादी चिंतक चिन्मय मिश्र ने कहा, “1936 में गांधी जी सेवाग्राम आए। वे यहॉं छह साल रहे। सेवाग्राम बापू की प्रयोग स्थली है। यहां आ कर उन्होंने ‘नई तालीम’ की नींव डाली। यहां तक कि ‘भारत छोड़ो आंदोलन’ की योजना यहीं बनी।”

उन्होंने कहा, “गांधी जी का जीवन सिर्फ़ सत्य का प्रयोग नहीं था, बल्कि रचनात्मक जीवन था।” परिचय वक्तव्य के बाद मुम्बई हाईकोर्ट के सेवानिवृत्त न्यायाधीश गौतम शिरीष पटेल ने ‘न्यायपूर्ण एवं मानवीय समाज के निर्माण में संवैधानिक मूल्यों का विशिष्ट महत्व’ विषय पर अपना ऑनलाइन वक्तव्य देते हुए कहा, “हमारा संविधान ऐसा ग्रंथ है, जो हमें एक रखता है। हमारा संविधान केवल कानून और विचारधाराओं का दस्तावेज़ नहीं है, बल्कि भारत के स्वरूप की कल्पना और उसके भविष्य की दृष्टि भी है। संविधान की ताक़त तीन शब्दों ‘हम भारत के लोग’ में निहित है।” उन्होंने कहा,”संविधान के तीन अनुच्छेद 14, 19 और 21 ऐसे हैं, जो हमें शासन की निरंकुशता से बचाते हैं। दरअसल, संविधान एक दस्तावेज़ नहीं, एक आचारसंहिता है।” 

इस सत्र में मुख्य वक्तव्य वरिष्ठ पत्रकार और स्तंभकार रशीद किदवई ने दिया। ‘हम भारत के लोग और हमारी भागीदारी’ विषय पर अपनी बात रखते हुए उन्होंने कहा, “संविधान की जब प्रस्तावना बनी, तो संविधान सभा के सभी सदस्यों ने इसमें धर्म का इस्तेमाल करने के विरोध में अपना मत दिया।” उन्होंने कहा, “शिक्षा, स्वास्थ्य और सुरक्षा सरकार का दायित्व है, लेकिन आज हर चीज़ का निजीकरण किया जा रहा है। चुनावों में पैसा पानी की तरह बहाया जा रहा है। आलम यह है कि पिछले आम चुनाव में एक लाख पैंतीस हजार करोड़ रुपए ख़र्च हुए हैं।

अगर हमें सिस्टम को सही करना है, तो पोलिटिकल फंडिंग पर अंकुश लगना चाहिए।” अपनी बात को आगे बढ़ाते हुए उन्होंने कहा, “आज हमारे यहां जो राजनीतिक गड़बड़ियां हैं, वे राजनीतिक जागरूकता की कमी की वजह से हैं। जब हम कुछ ख़रीदते हैं, तो उस पर काफ़ी रिसर्च करते हैं, लेकिन अच्छे उम्मीदवार के चयन में कोई रिसर्च नहीं करते।” इस सत्र का दूसरा वक्तव्य ‘संवैधानिक मूल्यों का उद्घोष और हमसे अपेक्षाएं’ विषय पर सुप्रीम कोर्ट एडवोकेट और ‘द लॉजिस्ट’ के सम्पादक डॉ. रितम खरे ने  दिया। उन्होंने कहा, “संवैधानिक मूल्यों की जानकारी हमें बेहतर नागरिक बनाती है। हमारे संविधान में सभी को कानून सुरक्षा प्रदान करता है लेकिन सरकारों ने हमारे नागरिकों को कभी संवैधानिक शिक्षा देने की कोशिश नहीं की।”

इस सेशन में ‘संविधान संवाद’ से प्रकाशित दो पुस्तकों ‘संविधान संवाद अनुभव यात्रा’ और ‘सूत्रों में संविधान’ का अतिथियों द्वारा विमोचन भी किया गया। सत्र का समापन पॉडकास्ट ‘चक्रम श्रृंखला’ के परिचय एवं लोकार्पण से हुआ। उसके बाद इस सीरीज़ का एक छह मिनट का वीडियो दिखाया गया। जिसे सभी ने ख़ूब पसंद किया।

प्रोग्राम का दूसरा सत्र ‘संवाद सत्र’ था। जिसमें रितम खरे और रशीद किदवई से अलग—अलग विषयों पर संवाद किया गया। दादा धर्माधिकारी कक्ष के अलावा बंग सभागृह में समानांतर सत्र आयोजित हुए। वरिष्ठ पत्रकार रशीद किदवई से ‘संवैधानिक मूल्य व हमारे समय की ख़बरें’ विषय पर संवाद किया गया। जिसमें बड़ी संख्या में युवा पत्रकारों ने उनसे सवाल—जवाब किए। कार्यक्रम स्थल के वाचनालय में ‘संविधान संवाद वीथिका’ भी बनाई गई थी। यह वीथिका ‘संविधान संवाद’ के फेलो द्वारा तैयार की गई थी। जिसमें चित्रों, न्यूज कटिंग और ग्राफिक्स के ज़रिए चीज़ों को बड़े ही सरल ढंग से समझाया गया था। संगत के दूसरे दिन ‘विकास संवाद’ के सह निदेशक राकेश मालवीय ने सत्र का आरंभ करते हुए पिछले दिन की गतिविधियों की जानकारी दी। उसके उपरांत मुख्य सत्र प्रारंभ हुआ। 

इस सत्र में ‘संवै​धानिक मूल्य और उनका क्रियान्वयन’ विषय पर मुख्य वक्तव्य सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ अधिवक्ता और लेखक संजय पारिख ने दिया, जो कि ऑनलाइन था। इसके बाद मीडिया विशेषज्ञ प्रोफ़ेसर आनंद प्रधान ने ‘सत्य की खोज : वैज्ञानिक तरीक़े, साधन और मूल्यों से संबंध’ विषय पर वक्तव्य दिया। संविधान अध्येता और लेखक सचिन कुमार जैन ने ‘बंधुता का भारतीय संदर्भ’ विषय पर अपनी बात रखी, तो वरिष्ठ पत्रकार और स्तंभकार अरुण त्रिपाठी ने अध्यक्षीय उद्बोधन दिया। इस सत्र का समापन फेलो साथियों को सहभागिता प्रमाण पत्र वितरण के साथ हुआ। 

अगले सत्र में भारतीय संविधान के निर्माण पर आधारित राज्यसभा चैनल की चर्चित श्रृंखला ‘संविधान का निर्माण/शोध प्रक्रिया’ पर राज्यसभा चैनल के पूर्व कार्यकारी संपादक राजेश बादल ने अपने अनुभव साझा किए। उनसे संवाद संविधान संवाद फेलो शिशिर अग्रवाल ने किया। दोपहर भोजन के उपरांत दो समानांतर सत्र आयोजि​त किए गए। यह भी संवाद सत्र थे। पहला संवाद, ‘पत्रकारिता के मूल्य और भारतीय संदर्भ’ विषय पर प्रोफ़ेसर आनंद प्रधान से था, तो दूसरा संवाद सचिन कुमार जैन से किया गया। उनका विषय ‘संविधान की भारतीय ऐतिहासिक पृष्ठभूमि या संवैधानिक और सामाजिक मूल्यों में अंतर्विरोध’ था।

शाम को सभी साथियों ने सेवाग्राम आश्रम की बापू कुटिया के अवलोकन के साथ—साथ प्रार्थना सभा में भी हिस्सा लिया। संगत के तीसरे दिन वरिष्ठ पत्रकार और स्तंभकार अरविंद मोहन ने ‘संवैधानिक मूल्य और हम : गांधी आश्रमों में जीवन’, सामाजिक कार्यकर्ता दीपा पवार ने ‘मानसिक न्याय : वंचित समुदाय के मानसिक स्वास्थ्य पर सामाजिक न्याय तंत्र के विभिन्न पहलुओं का प्रभाव और अनुभव’ विषय पर अपने सारगर्भित वक्तव्य दिए। 

वक्तव्य के उपरांत सवाल—जवाब हुए। जिसमें सभी प्रतिभागियों ने पूरी गर्मजोशी से हिस्सा लिया। इस सत्र में अध्यक्षीय उद्बोधन अधिवक्ता और ‘संविधान संवाद’ के मार्गदर्शक विभूति झा ने दिया। संविधान उत्सव का विराम वक्तव्य वरिष्ठ पत्रकार चिन्मय मिश्र, तो संविधान उत्सव में शामिल सभी साथियों का आभार राकेश मालवीय ने किया। ‘हम, भारत के लोग और हमारा संविधान उत्सव’ संगत का समापन ग्रुप फ़ोटो से हुआ। 

(वरिष्ठ पत्रकार ज़ाहिद ख़ान की रिपोर्ट।)

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